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पलट गया हाईकोर्ट का फैसला

28/11/2019

पलट गया हाईकोर्ट का फैसला


नौनवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने बहुप्रतीक्षित अयोध्या मामले में फैसला सुना दिया। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इलाहाबाद हाइकोर्ट के निर्णय से बिल्कुल विपरीत है। हाईकोर्ट के फैसले के करीब 9 साल बात यह ऐतिहासिक फैसला आया। इस सुप्रीम फैसले का सभी पक्षों ने स्वागत किया है। हाईकोर्ट का फैसला जहां 285 पन्नों में सिमटा था, वहां सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला 1045 पन्नों में समाहित है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में अंतर एवं समानता पर एक नजर डालते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के जिस फैसले को पूरी तरह पलट दिया, वह है विवादित रही 2.77 एकड़ जमीन। हाईकोर्ट ने इस जमीन को तीन बराबर हिस्सों में बांटा था। इस पर एक समान रूप से निर्मोही अखाड़े, रामलला विराजमान और सुन्नी वक्फ बोर्ड को दे दिया गया था। मगर सुप्रीम कोर्ट ने पक्षकार निर्मोही अखाड़े की याचिका खारिज कर दी। उसे जमीन के मालिकाना कब्जे से बाहर कर दिया। शिया बोर्ड का भी याचिका को खारिज कर दिया।

नौ साल पूर्व इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अयोध्या मामले पर फैसला सुनाया था। अब इस पर सुप्रीम कोर्ट का सुप्रीम फैसला आ गया है। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पूरी तरह से उलट दिया। देखते हैं, दोनों के फैसले में क्या अंतर है और क्या समानता।

सुप्रीम कोर्ट ने सुन्नी वक्फ बोर्ड को विवादित जमीन के एक तिहाई भाग का मालिकाना हक माना था। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। उसने पूरी जमीन का मालिकाना हक रामलला विराजमान को दिया है। जबकि सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद के लिए सरकार से अलग पांच एकड़ की जमीन मुहैया करवाने का आदेश दिया है। यही नहीं सुप्रीम पोर्ट ने सरकार को सीधा आदेश दिया है कि वह तीन महीने के अंदर राम मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट बनाकर इसे पूरा करवाए। हाईकोर्ट ने निर्मोही अखाड़े को सेवादार माना था। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने अखाड़े को ऐसा कोई अधिकार नहीं दिया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना था कि मंदिर का निर्माण मुगल शासक बाबर ने करवाया था। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मस्जिद का निर्माण उसके सेनापति मीर बाकी ने करवाया था। हाईकोर्ट का फैसला बहुमत के आधार पर सुनाया गया था। सुप्रीम कोर्ट का फैसला एकमत से लिया गया। इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने माना कि गर्भगृह ही भगवान राम का जन्मस्थान है। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने माना कि विवादित ढांचे के नीचे मंदिर मौजूद था।

गौरतलब है कि 1989 में राम जन्म भूमि और बाबरी मस्जिद जमीन विवाद का ये मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा था। हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने वर्ष 2003 में विवादित ढांचे वाली जगह का पुरातात्विक सर्वेक्षण करने का आदेश दिया था। इस सर्वेक्षण के दौरान विवादित स्थल के नीचे कई खम्भे, चबूतरे और अन्य सामान मिला था। जिसने साबित किया कि यहां पूर्व में मंदिर था। वर्ष 2003 से पहले 1975 में भी एक बार इस विवादित स्थल का सर्वे किया गया था। आखिरकार हाईकोर्ट ने 2010 में सुनवाई पूरी की और अपना फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने अपने फैसले के दौरान टिप्पणी की थी कि यह जमीन एक ऐसा छोटा सा टुकड़ा है, जहां देवता भी पैर रखने से डरते हैं। यह टुकड़ा एक तरह से बारूदी सुरंग की तरह है, जिसे हमने साफ करने की कोशिश की है। हाईकोर्ट में यह सुनवाई जस्टिस सुधीर अग्रवाल, जस्टिस एसयू खान और जस्टिस धर्मवीर शर्मा की पीठ ने की थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस जमीन को पूरी तरह रामलला विराजमान को सौंप दिया है। हाई कोर्ट के फैसले से कोई पक्षकार संतुष्ट नहीं था। उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 14 अपील दायर की गई। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का पूरा देश स्वागत कर रहा है।


 
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