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विभाग ने माना वेबुनियाद आरोप

12/07/2019

विभाग ने माना वेबुनियाद आरोप

संंजय श्रीवास्तव पर लगा, यौन उत्पीड़न का आरोप झूठा है। चौंक गए! तो उसमें कोई हर्ज नहीं है। यह खबर ही ऐसी है जो सुनकर कोई भी चौंक जाएगा। कारण यह है कि संजय को जबरन सेवामुक्त करने के लिए, इसी को आधार बनाया गया है। जब वह आधार ही फर्जी हंै तो आश्चर्यचकित होना स्वभाविक है। लेकिन इसके साथ ही एक सवाल भी पैदा होता है, वह यह कि आखिर कैसे आरोप को फर्जी बताया जा रहा है। सरकार ने तो इतना बड़ा आरोप लगाने और सेवामुक्त करने से पहले, जांच तो जरूर की होगी। दस्तावेज बताते हैं कि वित्त मंत्रालय ने आरोपों को लेकर कोई जांच-पड़ताल नहीं की। उसने बस सेवामुक्त कर दिया। यह बात हवा में नहीं कही जा रही है। इसके पीछे ठोस तर्क नहीं प्रमाण है। वे ऐसे हंै जो संदेह से परे हैं। उन पर कोई सवाल नहीं खड़ा कर सकता। खुद वित्त मंत्रालय उसकी विश्वसनीयता को नकार नहीं सकता। उसकी वजह यह है कि वे दस्तावेज वित्त मंत्रालय के ही हैं। वही दस्तावेज बताते हंै कि संजय श्रीवास्तव पर लगा आरोप झूठा है। उसमें कोई सच्चाई नहीं है। इस तरह के आरोप उन्हें बदनाम करने के लिए गढ़े गए थे, जिसे उनके ही मंत्रालय ने खारिज कर दिया था।

यह बात पहले भी साबित हो चुकी है। लेकिन न तब वित्त मंत्रालय ने इस पर ध्यान दिया था और न अब। इसकी बड़ी वजह मंत्रालय में सक्रिय चिदंबरम गैंग है। उसी की वजह से ही संजय श्रीवास्तव को यौन उत्पीड़न में फंसाया गया। तमाम जांच से बरी होने के बाद भी आरोप उनसे चिपका रहा। ऐसा तब हो रहा है जब उनका मंत्रालय ही कह रहा है कि आरोप झूठा है।

मगर ताज्जुब इस बात का है कि जिस आरोप को मंत्रालय ने खारिज कर दिया, उससे राजस्व सचिव अजय भूषण पांडे अनजान हैं। क्या ऐसा संभव है? वे राजस्व सचिव हंै। उन्हें तो मंत्रालय की हर हलचल की खबर रहती होगी। अगर नहीं रहती तो राजस्व सचिव को अपने पद से हट जाना चाहिए। वह इसलिए कि उनकी सुस्ती से सरकार को भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। ऐसा न हो इसलिए उन्हें सतर्क रहना चाहिए। अगर वे सतर्क रहते तो 22 मई 2019 को हुए आदेश की जानकारी रहती। वह आदेश बहुत महत्वपूर्ण है। इसलिए नहीं कि उसमें संजय श्रीवास्तव की बेगुनाही का सबूत है बल्कि इसलिए क्योंकि वह न्याय को स्थापित करता है और न्याय किसी भी व्यक्ति का नैसर्गिक अधिकार है। लगता है राजस्व सचिव को इसका ज्ञान नहीं है। यदि होता तो वे 22 मई के आदेश को जरूर पढ़ते। संभव है कि पढ़ा भी हो और उन्हें पता भी हो कि संजय पर लगा आरोप फर्जी है। लेकिन फिर भी उन्होंने सरकार को यह बताना जरूरी नहीं समझा होगा। जाहिर है उनकी वफादारी सरकार के बाहर बैठे आकाओं के प्रति रही होगी। उन्हें ही संजय श्रीवास्तव का खौफ है। उसी खौफ से निपटने के लिए उन्हें जबरन सेवामुक्त करने का षडयंत्र रचा गया। उसमें वे अभी सफल रहे। लेकिन सच को वे छुपा नहीं पाए। वह बाहर आ गया जो दस्तावेज के रुप में मौजूद है।

22 मई का आदेश पहला दस्तावेज है। उसमें आसिमा नेब के फरेब की कहानी है। आसिमा नेब उन दो महिलाओं में से एक हंै जिन्होंने संजय श्रीवास्तव पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है। दूसरी महिला सुमना सेन हैं। इन दोनों महिलाओं पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। पर दोनों जबरन सेवामुक्त किए गए, अधिकारियों की सूची में नहीं है और जिस पर भ्रष्टाचार का एक भी आरोप नहीं है, वह सूची में शामिल है। यह खेल कैसे हुआ? इस पर बात अगली रिपोर्ट में होगी। अभी तो मसला यौन उत्पीड़न का है जिसमें 22 मई की तारीख बहुत महत्व रखती है। इसी दिन आयकर विभाग ने आसिमा नेब के खिलाफ एक आदेश जारी किया। उसमें कहा गया कि आसिमा नेब के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज काराया जाए। सवाल यह है क्यों? इसका जवाब आदेश में दिया गया है। उसके मुताबिक आसिमा नेब सबको डराती धमकाती है। विभाग के कनिष्ठ और वरिष्ठ अधिकारियों को धमकाते हुए कहती है कि मेरे खिलाफ अगर किसी ने शिकायत की तो उसे यौन उत्पीड़न के आरोप में फंसा दूंगी। यही वजह है कि उनके भ्रष्टाचार पर कोई सवाल नहीं करता है। न ही कोई उनकी लापरवाही की चर्चा करता है। बतौर अधिकारी उनका कामकाज का तरीका बेहद घटिया है। आदेश में मोटे तौर पर दो बातें कही गई हैं।

पहली-आसिमा नेब एक अक्षम अधिकारी है। यह भी सेवामुक्त करने का एक आधार है। लेकिन आसिमा नेब पर यह लागू नहीं होता। दूसरी बात जो कही गई है, वह यह कि यौन उत्पीड़न का फर्जी आरोप लगाना, आसिमा नेब की फितरत है। यह बात पहले भी साबित हो चुकी है। लेकिन न तब वित्त मंत्रालय ने इस पर ध्यान दिया था और न अब। इसकी बड़ी वजह मंत्रालय में सक्रिय चिदंबरम गैंग है। उसी वजह से ही संजय श्रीवास्तव को यौन उत्पीड़न में फंसाया गया। तमाम जांच से बरी होने के बाद भी आरोप उनसे चिपका रहा। ऐसा तब हो रहा है जब उनका मंत्रालय ही कह रहा है कि आरोप झूठा है। बड़ी बात यह है कि ऐसा कोर्ट में कहा जा रहा है। बात दिसंबर 2008 की है। केन्द्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल ने आयकर विभाग से कहा कि संजय श्रीवास्तव को यौन उत्पीड़न वाले मामले की जांच रिपोर्ट दी जाए। विशाखा दिशानिर्देश के मुताबिक अगर कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का कोई मामला होता है, तो उसकी जांच के लिए समिति बनानी होती है। जो विभाग बनाता है ताकि इस तरह के मामले की जांच हो सके। चूंकि संजय श्रीवास्तव पर आरोप है, इसलिए इसकी भी विभागीय जांच हुई होगी।

यह मानते हुए ट्रिब्यूनल ने विभाग को आदेश किया, वे रिपोर्ट संजय श्रीवास्तव को सौंपे दे। आरोपी होने की वजह से उन्हें भी रिपोर्ट मिलनी चाहिए थी। इसलिए ट्रिब्यूनल ने आयकर विभाग से कहा। विभाग ने जो जवाब दिया, वह चौंकाने वाला है। उसने ट्रिब्यूनल से कहा कि सुमना सेन और आसिमा नेब ने यौन उत्पीड़पन की कोई शिकायत नहीं की है। विभाग आगे कहता है कि जब से महिला सेल (26-9-2006) बना है तब से संजय श्रीवास्तव के खिलाफ किसी ने यौन उत्पीड़न की कोई शिकायत नहीं की है। इस वजह से न तो कोई जांच हुई है और न कोई जांच रिपोर्ट बनी है। मतलब साफ है आरोप बस झूठा है। उस झूठे आरोप पर कठोर कार्रवाई की गई है।


 
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