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टूटा कानून और फूटी व्यवस्था

28/11/2019

टूटा कानून और फूटी व्यवस्था

राकेश कायस्थ

कानून व्यवस्था एक सुंदर शब्द-युग्म है। अंग्रेजी में इसे लॉ एंड आॅर्डर कहते हैं। कानून वकीलों से ज्यादा कोई नहीं जानता है और कानून के तहत व्यवस्था बनाये रखने में पुलिस वालों का कोई जवाब नहीं है। दिल्ली की तीस हजारी अदालत में वकील और पुलिस वाले आमने-सामने आये तो कुछ लोगों ने सोचा कि मणिकांचन योग बन गया है। कानून के दो सबसे बड़े रखवालों की साझा उपस्थिति माहौल को गरिमामय बना देगी। कानून व्यवस्था की स्थिति एकदम बुलंदी पर होगी। लेकिन अदालत के अहाते में जो हुआ, उसे देखकर लगा कि कानून की देवी ने इसी दिन के लिए आंखों पर पट्टी बांधी होगी। ‘कानून’ ने मार-मारकर ‘व्यवस्था’ का कचूमर निकाल दिया और खुद भी लहू-लुहान होकर अदालत के दूसरे कोने में जा गिरा। कानून कराह रहा था और टूटी टांग वाली व्यवस्था चीख-चीखकर जान बचाने की गुहार लगा रही थी। क्या पहले कभी किसी ने देखा था ऐसा ‘अद्भुत’ दृश्य? कोई इल्जाम लगा रहा था कि काली वर्दी वालों ने खाकी वर्दी वालों को पार्किंग के मामूली झगड़े में कूट दिया।

ऐसा कहा जाता है कि अगर रोने का कोई फायदा नहीं हो तो थोड़ा हंस लेना चाहिए। आइये काली और खाकी वर्दी की इस ‘खाली-पीली’ ड्रामेबाजी पर हम भी थोड़ा हंस लें।

दुनिया की हिफाजत करने वाले खुद को वकीलों की पिटाई से नहीं बचा पाये। दूसरा पक्ष इस बात को झूठा बताते हुए कह रहा था कि काली वर्दी वाले बेचारे रामजी की गाय हैं। पहले उनकी पिटाई हुई थी। अब बदले में उन्होंने दो-चार गाड़ियां जला दीं तो क्या गुनाह किया? वैसे भी वकील नियम के पाबंद होते हैं। वे भले ही सामने वाले के हाथ-पांव तोड़ दें लेकिन कानून कभी नहीं तोड़ सकते हैं। इसी तरह पुलिस वाले भी हर हाल में व्यवस्था बनाये रखते हैं, भले ही इसके लिए उन्हें कानून ही क्यों ना तोड़ना पड़े। देखा जाये तो दोनों ही बिरादरियां नैतिकता के उच्चतम मानदंड पर खड़ी हैं। कोर्ट-कचहरी से लेकर जेल और बेल के हर खेल में दोनों साथ-साथ भी हैं। फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि काली वर्दी और खाकी वर्दी वाले एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गये। तीस हजारी में तमाशा देखने वाले बहुत से लोगों का कहना है कि मामला सिर्फ अहं का है। पुलिस वाला बड़ा या फिर वकील? यह लड़ाई अब दिल्ली से निकलकर देश के बाकी हिस्सों में फैलती जा रही है। वकील पुलिस वालों से मांग कर रहे हैं कि वे अपने ही खिलाफ एफआईआर दर्ज करें। उधर दुनिया की रक्षा करने वाले पुलिसकर्मी अपने ही हेडक्वार्ट्रर के बाहर जमा होकर ‘वकीलों से बचाओ’ की चिरौरी करते दिखाई दे रहे हैं। जनता खाकी वर्दी वालों से डरती है और काले कोट वालों से भी पनाह मांगती है। लेकिन एकदूसरे के खिलाफ डटे दोनों तरह की वर्दी वाले अब जनता के दरबार में आ गये हैं।

जनता कभी कराहते ‘कानून’ की तरफ देखती है तो कभी लंगड़ाती ‘व्यवस्था’ की तरफ। उसे समझ में नहीं आ रहा कि आखिर कहे तो क्या कहे। लिहाजा वह सरकार की तरफ देख रही है। लेकिन सरकार बेचारी किस तरफ देखे? सरकार चाहे किसी की भी हो, वकीलों के बिना नहीं चल सकती। सरकार के लिए पुलिसिया डंडा भी उतना ही जरूरी है। ऐसे में वह किसका पक्ष ले? उसके लिए ‘गुरू गोविंद दोऊ खड़े’ वाली हालत हो गई। बच्चे अक्सर चोर-पुलिस खेलते हैं। लेकिन तीस हजारी कुटाई कांड के बाद अब वे वकील-पुलिस खेलने लगे हैं। सोशल मीडिया पर चुटकुलों की बहार आ गई है। किसी ने कार्टून बनाया कि हथकड़ी में बंधा चोर पुलिस वाले से कह रहा है, ‘‘अपने वकील को बुलाउं क्या?’’ यह सुनते ही पुलिस वाले की घिग्घी बंध रही है। कुछ बड़े पुलिस अधिकारियों ने ट्वीट किया है कि हमारे भी कुछ मानवाधिकार हैं। पुलिस के मुंह से मानवाधिकार शब्द सुनकर लोग पेट पकड़-पकड़कर हंस रहे हैं। वकीलों की तरफ से बार-बार ‘नैतिकता’ शब्द का उल्लेख हो रहा है। जनता कुछ ऐसा महसूस कर रही है, जैसे किसी ने उसे लाμटर का इंजेक्शन लगा दिया हो।


 
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