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फैसले का स्वागत भी, विरोध भी

25/11/2019

फैसले का स्वागत भी, विरोध भी

मोहम्मद शहजाद

योध्या मामले के मुस्लिम पक्षकारों ने अदालती फैसले का हर हाल में सम्मान करके एक नजीर पेश की है। बाबरी मस्जिद के मुख्य मुद्दई इकबाल अंसारी हमेशा से ही इस रुख पर कायम थे कि फैसला चाहे जो होए,हम हर हाल में उसका सम्मान करेंगे। सर्वोच्च न्यायालय के फैसला सुनाए जाने के बाद भी उनकी यही प्रतिक्रिया आई। उन्होंने कहा ‘‘हम सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का स्वागत करते हैं। सबसे बड़ी खुशी की बात यह है कि लंबे समय से विचाराधीन रहे इस मामले का आखिरकार अंत हो गया। हम अपनी तरफ से इस फैसले को चुनौती नहीं देंगे। अब सरकार की जिम्मेदारी है कि वह मस्जिद के लिए जमीन उपलब्ध कराए। यह एक तरह से मुसलमानों की जीत है।’’ सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील और आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव जफरयाब जीलानी ने इस फैसले का स्वागत किया है लेकिन साथ ही इसके कुछ बिंदुओं पर अपनी असहमति भी जताई है। किसी फैसले से असहमत होना एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वावभाविक है लेकिन उन्होंने भी लोगों से इस फैसले का सम्मान करने की अपील की है। उन्होंने कहा ‘‘इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की कुछ टिप्पणी बिलकुल उपयोगी है जो देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को मजबूत करने वाली है। हालांकि कुछ बातें पहली नजर में त्रुटिपूर्ण लगती हैं।

लंबे अर्से से चले आ रहे राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद भूमि स्वामित्व विवाद का पटाक्षेप हो गया। इससे विवादित स्थल पर राम मंदिर के निर्माण का रास्ता साफ हो गया। फैसला किसके पक्ष में गया और किसके विरोध में, यह बहस का अलग विषय है लेकिन इस दौरान देशवासियों ने जिस तरह संयम और शांति का प्रदर्शन किया, वह काबिलेतारीफ है।

सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी माना है कि बाबरी मस्जिद का निर्माण मंदिर तोड़कर नहीं किया गया लेकिन कुछ बातों पर हम संतुष्ट नहीं हैं। हम फैसले का गहनता से अध्यन कर रहे हैं। मेरी अपनी राय है कि हम पुनर्विचार याचिका दायर करें लेकिन यह फैसला आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को करना है। बोर्ड की कार्यकारी समिति की 17 नवंबर को बैठक होने वाली है। हम उसमें ही आगे की रणनीति तय करेंगे। हमने हमेशा कहा है कि अदालत के फैसले का सम्मान करेंगे। ऐसे में मेरी देश के मुसलमानों से अपील है कि वह इसे अपनी हार न मानें और अमन बनाए रखें।’’ आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य कमाल फारूकी ने भी फैसले का स्वागत करते हुए कहा ‘‘अब तक मुसलमानों के ऊपर कई तरह के आरोप लगाए जा रहे थे। मसलन मस्जिद, मंदिर तोड़कर बनाई गई। कोर्ट के फैसले से इस तरह के आरोप धुल गए। अदालत ने माना कि वहां 528 साल तक मस्जिद थी। वहां नमाज होती रही। विवाद चबूतरे को लेकर रहा। अदालत ने यह भी माना कि मस्जिद में मूर्ति रखी गई और एक साजिश के तहत 1992 में उसे शहीद कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने हमेशा कहा कि वह फैसला आस्था पर नहीं, बल्कि सबूतों पर सुनाएगा। इसके बावजूद भारतीय पुरातत्व विभाग (एएसआई) द्वारा खोजे गए कुछ अवशेषों पर उसका फैसला आया है।

अदालत ने संविधान के अनुच्छेद-142 का इस्तेमाल किया जो बहुत विशेष परिस्थितियों के लिए है। इससे लगता है कि उसका फैसला आस्था पर आधारित है। बहरहाल, अपने पहले से किए गए वादे के अनुसार हम अदालत के फैसले का सम्मान करते हैं।’’ प्रख्यात मुस्लिम विद्वान पद्मश्री प्रोफेसर अखतरुल वासे ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर अपनी सधी हुई प्रतिक्रिया देते हुए कहा ‘‘फैसले के कानूनी बिंदुओं पर तो कानूनदां ही बहस कर सकते हैं। फिर भी एक आम हिंदुस्तानी मुसलमान होने के नाते मैं इसका स्वागत करता हूं। आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने अगस्त 2019 में ही हमसे कहा था कि फैसला चाहे पक्ष में हो या खिलाफ हो, हम उसका सम्मान करेंगे। चूंकि यह हमारा कमिटमेंट है तो हमें इसे मानना चाहिए। हो सकता है कि कुछ लोग इससे संतुष्ट न हों तो यह लोकशाही में उनका अधिकार है। उनसे मेरी अपील है कि संवाद कभी बंद न करें क्योंकि इससे विवाद बढ़ता है। बस संवाद करते हुए यह ध्यान रखें कि सौदा न हो। इसके साथ ही मेरी सरकार, उसका मार्गदर्शन करने वाले शीर्ष नेताओं और आमजन से यह अपील है कि अब कोई और अयोध्या न हो। हम 70 साल से इसमें उलझे रहे। न जाने कितनी दीवारें खिंच गईं, कितनी खाई खोदी गई। इससे केवल मुसलमान या हिंदुओं का नुकसान नहीं हुआ बल्कि भारत माता आहत हुई।’’ प्रोफेसर अख्तरुल वासे ने मुसलमानों से अपील करते हुए कहा ‘‘फैसले से कुछ लोगों का असंतुष्ट होना स्वाभाविक है लेकिन इसकी तीन बातें बहुत आकर्षित करती हैं। पहला यह कि अदालत ने माना कि बाबरी मस्जिद को मंदिर तोड़कर नहीं बनाया गया। दूसरे यह कि 22-23 दिसंबर 1949 में मूर्तियां मस्जिद में साजिश के तहत रखी गईं और फिर 6 दिसंबर 1992 को अदालत के आदेश की अवहेलना करते हुए बाबरी मस्जिद को शहीद कर दिया गया। तो इतिहास में यह बात दर्ज रहेगी कि अदालत ने माना है कि देश के मुसलमानों के साथ ज्यादती की गई। इसकी हमें कद्र करनी चाहिए।’’

सरकार के जरिए उपलब्ध कराई गई जमीन पर मस्जिद बनाने की इजाजत शरीयत नहीं देती है। इसलिए मुसलमानों को चाहिए कि इस जमीन का मुआवजा सरकारी खजाने में जमा करा दें।

मुस्लिम पक्षकारों में से एक जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना सैय्यद अरशद मदनी ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए देश के मुसलमानों और दूसरे देशवासियों से यह अपील की कि वह इस निर्णय को हार-जीत की दृष्टि से ना देखें और देश में अमन एवं भाइचारे का माहौल बनाए रखें। मदनी ने कहा कि यह निर्णय हमारी अपेक्षा के अनुकूल नहीं है परन्तु सुप्रीम कोर्ट सर्वोच्च संस्था है। उन्होंने यह भी कहा कि देश के संविधान ने हमें जो शक्तियां प्रदान की हैं, उस पर निर्भर रहते हुए जमीयत उलेमा-ए-हिन्द ने आखिरी हद तक न्याय के लिए लड़ाई लड़ी। देश के सुप्रसिद्ध अधिवक्ताओं की सेवाएं लीं। अपने पक्ष में तमाम सबूत इकठ्ठा किए और अदालत के सामने रखे। उन्होंने कहा कि अपने दावे को मजबूती से रखने के लिए हम जो कर सकते थे, वह किया और हम इसी बुनियाद पर आशावान थे कि निर्णय हमारे पक्ष में आएगा।’’ मुसलमानों के एक और संगठन जमात-एइस् लामी हिंद के प्रमुख सआदतुल्लाह हुसैनी ने कहा ‘‘अदालत के फैसले से वह पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं। क्योंकि सिविल सोसायटी में कानून-व्यवस्था का बड़ा महत्व है, इसलिए वह इसे कबूल करेंगे।’’ उन्होंने देशवासियों से अमन-चैन बनाए रखने की अपील की। बरेली स्थित विश्व प्रसिद्ध आला हजरत की दरगाह के नायब सज्जादा नशीन मौलाना तौसीफ रजा खान ने अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए कहा है कि इससे देश में आपसी मेलजोल और सौहार्द की भावना पैदा होगी। उन्होंने अदालत द्वारा सरकार से सुन्नी वक्फ बोर्ड को अयोध्या में 5 एकड़ जमीन मस्जिद बनाने के लिए दिए जाने के फैसले का स्वागत किया है लेकिन इस बात की शंका जताई कि सरकार के जरिए उपलब्ध कराई गई जमीन पर मस्जिद बनाने की इजाजत शरीयत नहीं देती है। इसलिए मुसलमानों को चाहिए कि इस जमीन का मुआवजा सरकारी खजाने में जमा करा दें।

आॅल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अंबर ने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए इसे मुसलमानों के हित में बताया है लेकिन उन्होंने अदालत के जरिए मुसलमानों को मस्जिद बनाने के लिए 5 एकड़ जमीन दिए जाने के फैसले पर अपनी राय देते हुए कहा है कि वहां पर मस्जिद बनाने के बजाय स्कूल या अस्पताल बनाया जाना चाहिए। उन्होंने जोड़ा कि सरकार के जरिए उपलब्ध कराई गई जमीन पर मस्जिद बनाने के लिए शरीयत इजाजत नहीं देती है। अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की तारीफ करते हुए मरकजी जमीअत अहल-ए-हदीस के अमीर मौलाना अली असगर इमाम मेहदी सलफी ने कहा ‘‘अरब कहते हैं मिस्र पूरी दुनिया की मां है और उन्हें इस पर गर्व है। हम लोग कहते हैं कि भारत दुनिया का बाप है और इस ऐतिहासिक फैसले से हमने साबित कर दिया कि भारत दुनिया का बाप है।’’


 
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